अनुसूचित जातियों की समस्याएं , संवैधानिक व्यवस्थाएं तथा सम्बन्धित अधिनियम [ Problems , Constitutional Provisions and Related Legislation of SCHEDULED CASTES ] विस्तृत जानकारी

नमस्कार दोस्तों , जैसा कि आप Title में देख चुके हैं कि आज हम अनुसूचित जातियों को लेकर एक विस्तृत जानकारी आपके साथ साझा करने वाले हैं । आज के इस आर्टिकल में हम अनुसूचित जातियों की समस्याएं , संवैधानिक व्यवस्थाएं तथा सम्बन्धित अधिनियम [ Problems , Constitutional Provisions and Related Legislation of SCHEDULED CASTES ] की विस्तृत जानकारी को आपके साथ साझा करेंगे तो आइए शुरू करते हैं ।

 अनसूचित जातियों और जनजातियों को भारत के कमजोर और पिछड़े वर्गों के अन्तर्गत गिना जाता है । स्वतन्त्र भारत के संविधान निर्माताओं के कमजोर वर्ग , विशेष से अनुसूचित जातियों और जनजातियों का विशेष ध्यान रखा और उनके विकास एवं उत्थान के लिए संविधान में अनेक प्रावधान किये । हम वहां अनुमृचित जातियों एवं जनजातियों का अर्थ , उनकी समस्याओं तथा समस्याओं के समाधान हेतु किये गये संवैधानिक प्रावधानों एवं सम्बन्धित अधिनियम का उल्लेख करेंगे ।


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अनुसूचित जाति का अर्थ ( MEANING OF SCHEDULED CASTE ) 

सामान्यतः अनुसूचित जातियों को अस्पृश्य जातियां भी कहा जाता है । अतः इसकी परिभाषा अस्पृश्यता के आधार पर भी की गयी है । साधारणतः अनुसूचित जाति का अर्थ उन जातियों से लगाया जाता है जिन्हें धार्मिक , सामाजिक , आर्थिक और राजनैतिक सुविधाएं दिलाने के लिए जिनका उल्लेख संविधान की अनुसूची में किया गया है । इन्हें अछूत जातियां , दलित वर्ग , बाहरी जातियां और हरिजन , आदि नामों से भी पुकारा जाता है । अनुसूचित जातियों को ऐसी जातियों के रूप में परिभाषित किया गया है जो घृणित पेशों के द्वारा अपनी आजीविका अर्जित करती हैं । किन्तु अस्पृश्यता के निर्धारण का यह सर्वमान्य आधार नहीं है । इसका कारण यह है कि अनेक ऐसी जातियां भी हैं जो घृणित व्यवसाय में लगी हुई नहीं हैं परन्तु फिर भी उन्हें संवैधानिक रूप से अनुसूचित जाति माना जाता है । अस्पृश्यता का सम्बन्ध प्रमुखतः पवित्रता एवं अपवित्रता की धारणा से है । हिन्दू समाज में कुछ व्यवसायों या कार्यों को पवित्र एवं कुछ को अपवित्र समझा जाता रहा है । यहां मनुष्य या पशु पक्षी के शरीर से निकले हुए पदार्थों को अपवित्र माना है । ऐसी दशा में इन पदार्थों से सम्बन्धित व्यवसाय में लगी हुई जातियों को अपवित्र समझा गया और उन्हें अस्पृश्य कहा गया । अस्पृश्यता समाज की एक ऐसी व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत अस्पृश्य समझी जाने वाली जातियों के व्यक्ति सवर्ण हिन्दुओं को स्पर्श नहीं कर सकते ।

अस्पृश्यता का तात्पर्य - Untouchability

 अस्पृश्यता का तात्पर्य है ' जो छूने योग्य नहीं है । ' अस्पृश्यता एक ऐसी धारणा है जिसके अनुसार एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को छूने , देखने और छाया पड़ने मात्र से अपवित्र हो जाता है । सवर्ण हिन्दुओं को अपवित्र होने से बचाने के लिये अस्पृश्य लोगों के रहने के लिए अलग से व्यवस्था की गयी , उन पर अनेक निर्योग्यताएँ लाद दी गयीं और उनके सम्पर्क से बचने के कई उपाय किये गये । अस्पृश्यों के अन्तर्गत वे जातीय समूह आते हैं जिनके छूने से अन्य व्यक्ति अपवित्र हो जायें और पवित्र होने के लिये कुछ विशेष संस्कार करने पड़ें ।

इस सम्बन्ध में डॉ . के . एन . शर्मा ने लिखा है " अस्पृश्य जातियाँ वे हैं जिनके स्पर्श से एक व्यक्ति अपवित्र हो जाय और उसे पवित्र होने के लिए कुछ कृत्य करने पड़ें । 

आर . एन . सक्सैना ने इस बारे में लिखा है कि यदि ऐसे लागों को अस्पृश्य माना जाय जिनके छूने से हिन्दुओं को शुद्धि करनी पड़े तो ऐसी स्थिति में हट्टन के एक उदाहरण के अनुसार ब्राह्मणों को अस्पृश्य मानना पड़ेगा क्योंकि दक्षिण भारत में होलिया जाति के लोग ब्राह्मण को अपने गांव के बीच से नहीं जाने देते हैं और यदि वह चला जाता है तो वे लोग गांव की शुद्धि करते हैं । स्पष्ट है कि अस्पृश्यता के निर्धारण में छूने मात्र से अपवित्र होने की बात पर्याप्त नहीं है ।

 हट्टन ने उपर्युक्त कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए कुछ ऐसी निर्योग्यताओं का उल्लेख किया है जिनके आधार पर अस्पृश्य जातियों के निर्धारण का प्रयत्न किया गया है । हट्टन ने उन लोगों को अस्पृश्य माना है जो 
  •  उच्च स्थिति के ब्राह्मणों की सेवा प्राप्त करने के अयोग्य हों 
  •  सवर्ण हिन्दुओं की सेवा करने वाले नाइयों , कहारों तथा दर्जियों की सेवा पाने के अयोग्य हों , 
  • हिन्दू मन्दिरों में प्रवेश प्राप्त करने के अयोग्य हों 
  •  सार्वजनिक सुविधाओं ( पाठशाला , सड़क तथा कुआँ ) को उपयोग में लाने के अयोग्य हो और 
  •  घृणित पेशे से पृथक होने के अयोग्य हों । सारे देश में अस्पृश्यों के प्रति एकसा व्यवहार नहीं पाया जाता और न ही देश के विभिन्न भागों में अस्पृश्यों के सामाजिक स्तर में समानता पायी जाती है अतः हट्टन द्वारा दिये गये उपर्युक्त आधार भी अन्तिम नहीं हैं । 

डॉ . डी . एन . मजूमदार के अनुसार " अस्पृश्य जातियाँ वे हैं जो विभिन्न सामाजिक एवं राजनैतिक निर्योग्यताओं से पीड़ित हैं , जिनमें बहुत सी निर्योग्यताएँ उच्च जातियों द्वारा परम्परागत रूप से निर्धारित और सामाजिक रूप से लागू की गयी हैं । स्पष्ट है कि अस्पृश्यता से सम्बन्धित कई निर्योग्यताएं या समस्याएं हैं ।

अनुसूचित जातियों की समस्याएँ ( PROBLEMS OF SCHEDULED CASTES )


भारतीय समाज में व्याप्त विभिन्न समस्याओं में से अस्पृश्यता भी एक प्रमुख समस्या है भारत में अनुसूचित जातियों के लोगों की संख्या , जिन्हें अस्पृश्य माना जाता रहा है हमारे देश में इन व्यक्तियों को अस्पृश्यता के नाम पर मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया और निम्नतम स्तर का जीवन बिताने के लिए बाध्य किया गया । इन लोगों पर सामाजिक , आर्थिक एवं धार्मिक निर्योग्यताएं लाद दी गयीं जिनकी वजह से इन्हें जीवन की सब प्रकार की सुख - सुविधाओं से वंचित रहना पड़ा । अस्पृश्यता जाति - व्यवस्था के इतिहास के साथ जुड़ी हुई है । 

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक अनुसूचित जातियों ( अस्पृश्यों ) की अनेक निर्योग्यताएं रही हैं । निर्योग्यताओं का तात्पर्य है - किसी वर्ग अथवा समूह को कुछ अधिकारों या सुविधाओं को प्राप्त करने के अयोग्य मान लेना । भारत में अस्पृश्य या अनुसूचित जातियों की अनेक समस्याएं रही हैं । इन समस्याओं के कारण इन्हें जीवन में आगे बढ़ने और अपने व्यक्तित्व के विकास का अवसर नहीं दिया गया । अनुसूचित जातियों की प्रमुख समस्याएं निम्नांकित हैं :

सामाजिक समस्याएं - social problems

इन लोगों को मन्दिर प्रवेश , पवित्र नदी - घाटों के प्रयोग , पवित्र स्थानों पर जाने तथा अपने ही घरों पर देवी - देवताओं की पूजा करने का अधिकार नहीं दिया गया । इन लोगों को जन्म से ही अपवित्र माना गया है और इसी कारण इनके शुद्धिकरण के लिए संस्कारों की व्यवस्था नहीं की गयी है । 

अनुसूचित जातियों ( अस्पृश्यों ) को सवर्ण हिन्दुओं के साथ सामाजिक सम्पर्क रखने और उनके सम्मेलनों , गोष्ठियों , पंचायतों , उत्सवों एवं समारोहों में भाग लेने की आज्ञा नहीं दी गयी । उन्हें उच्च जातियों के हिन्दुओं के साथ खान - पान का सम्बन्ध रखने से वंचित रखा गया । इन लोगों को अन्य हिन्दुओं के द्वारा काम में लिए जाने वाले कुओं से पानी नहीं भरने दिया जाता , स्कूलों में पढ़ने एवं छात्रावासों में रहने नहीं दिया जाता था । दुकानदार इन्हें खाना नहीं देते , धोबी इनके कपड़े नहीं धोते , नाई वाल नहीं बनाते और कहार पानी नहीं भरते । इन्हें सवर्ण हिन्दुओं की वस्ती या मौहल्ले में रहने की आज्ञा नहीं थी । इन्हें शिक्षा प्राप्त करने की आज्ञा नहीं दी गयी । इन्हें चौपालों , मेलों तथा हाटों में शामिल होकर अपना मनोरंजन करने का अधिकार भी नहीं दिया गया । 

एक आश्चर्यजनक बात तो यह है कि स्वयं अस्पृश्यों में भी संस्तरण की प्रणाली अर्थात् ऊंच - नीच का भेद - भाव पाया जाता है । ये लोग तीन सौ से अधिक उच्च एवं निम्न जातीय समूहों में बंटे हुए हैं जिनमें से प्रत्येक समूह की स्थिति एक - दूसरे से ऊंची अथवा नीची है ।

आर्थिक समस्याएं Economics Problems

आर्थिक समस्याओं के कारण अनुसूचित जातियों की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय हो गई कि इन्हें विवश होकर , सवर्णों के झूठे भोजन , फटे - पुराने वस्त्रों एवं त्याज्य वस्तुओं से ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करनी पड़ी । अनुसूचित जातियों के लोगों को मल - मूत्र उठाने , सफाई करने , मरे हुए पशुओं को उठाने और उनके चमड़े से वस्तुएं बनाने का कार्य ही सौंपा गया । इन्हें खेती करने , व्यापार चलाने या शिक्षा प्राप्त कर नौकरी करने का अधिकार नहीं दिया गया । इन्हें भूमि - अधिकार तथा धन - संग्रह की आज्ञा नहीं दी गयी । इन लोगों को दासों के रूप में अपने स्वामियों की सेवा करनी पड़ती थी ।
 अनुसूचित जातियों का आर्थिक दृष्टि से शोषण हुआ है । उन्हें घृणित से घृणित पेशों को अपनाने के लिए बाध्य किया गया और बदले में इतना भी नहीं दिया गया कि वे भर - पेट भोजन भी कर सकें । हिन्दुओं ने धर्म के नाम पर अपने इस व्यवहार को उचित माना और अनुसूचित जातियों ( अस्पृश्यों ) को इस व्यवस्था से सन्तुष्ट रहने के लिए बाध्य किया ।
 इन लोगों को शासन के काम में किसी भी प्रकार का कोई हस्तक्षेप करने , कोई सुझाव देने , सार्वजनिक सेवाओं के लिए नौकरी प्राप्त करने या राजनीतिक सुरक्षा प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं दिया गया । 
उपर्युक्त समस्याएं मध्यकालीन सामाजिक व्यवस्था से विशेष रूप से सम्बन्धित हैं । वर्तमान में अस्पृश्यों एवं अनुसूचित जातियों की समस्याएं प्रमुखतः सामाजिक एवं आर्थिक हैं न कि धार्मिक और राजनीतिक । इन लोगों की निर्योग्यताएं नगरों में समाप्त - सी होती जा रही हैं ; परन्तु गांवों में आज भी दिखलायी पड़ती हैं । 

स्वतन्त्रता - प्राप्ति के बाद अनुसूचित जातियों के लोगों की समस्याएं दूर हुई हैं । किन्तु साथ ही यह भी सत्य है कि इनके लिए किये गये कल्याण - कार्यों के परिणामस्वरूप अनेक नवीन समस्याएं भी उत्पन्न हुई हैं । उदाहरणार्थ , इनमें राजनीतिक चेतना एवं अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी है जिसका परिणाम यह हुआ है कि सवर्णों एवं इन लोगों ( अनुसूचित जातियों ) में तनाव एवं संघर्ष उत्पन्न हुए हैं।
 अनुसूचित जातियों की एक नवीन समस्या यह भी है कि इनमें भी वर्ग - भेद पनपने लगा है । जिन परिवारों के सदस्यों ने उच्च शिक्षा का लाभ प्राप्त कर उच्च पद ग्रहण कर लिए हैं अथवा सरकार से ऋण या अन्य सुविधाएं प्राप्त कर अपनी आर्थिक स्थिति सुधार ली है , वे स्वयं को अपनी जाति के अन्य लोगों से पृथक् एवं उच्च समझने लगे हैं । इस प्रकार जिन लोगों ने अभिजात प्रस्थिति प्राप्त कर ली है उन लोगों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है । इन लोगों को संवैधानिक प्रावधानों का पूरा लाभ अब भी मिल रहा है । 

अनुसूचित जातियों के लोग चाहते हैं कि उनके साथ इन्सानों जैसा व्यवहार किया जाय , उन्हें भूमि से बेदखल नहीं किया जाय , उनसे वन्धुआ मजदूर या दास के रूप में कार्य नहीं लिया जाय , श्रम के बदले उन्हें पूरी मजदूरी दी जाय , उनके बच्चों को सवर्ण जातियों के बच्चों के समान समझा जाय , उन्हें शिक्षा सम्बन्धी पूरी सुविधाएं उपलब्ध हों । वे यह भी चाहते हैं कि देश की प्रजातान्त्रिक संस्थाओं में उन्हें भाग लेने का पूरा अवसर मिले । वास्तविकता यह है कि अनुसूचित जातियों को सवर्ण जातियों से नीचा समझा जाता है ।

 अनुसूचित जातियों के अस्सी से नब्बे प्रतिशत लोग गांवों में रहते हैं । इस पर भी प्रभु जातियों , उच्च जातियों एवं सवर्ण जातियों का नियन्त्रण एवं प्रभुत्व है । आज आर्थिक दृष्टि से अनुसूचित जातियों के लोग उच्च जातियों के सेठ - साहूकारों , भूस्वामियों , जमींदारों , आदि पर निर्भर करते हैं । इन लोगों को अपनी दयनीय दशा , अज्ञानता एवं निर्धनता के कारण इनके उत्थान के लिए किये गये कल्याण - कार्यों का पूरा लाभ भी नहीं मिल पाया है । ये आज भी गरीब हैं और इनकी गरीबी ही इनके शोषण का प्रमुख कारण है । इन सब समस्याओं के बावजूद अनुसूचित जातियों में जागरूकता आयी है , वे संगठित हुई हैं और एक शक्ति के रूप में उभरी हैं । 

पिछली कुछ दशाब्दियों से अपवित्रता - पवित्रता ( अशुद्धता - शुद्धता ) सम्बन्धी कठोरताओं में कमी आयी है । आज लोग अस्पृश्य समझे जाने वाले लोगों के साथ उठते - बैठते हैं , साथ - साथ काम करते हैं , एक - दूसरे के यहां आते - जाते भी हैं । अब लोगों का अस्पृश्यों के प्रति वैसा व्यवहार नहीं है जैसा पचास - साठ वर्ष पूर्व था । अब स्वयं अस्पृश्य जातियों में कुछ बदलाव आया है । अब तो केवल विशेष अवसरों , जैसे जन्म , विवाह , धार्मिक - उत्सव या जातीय आधार पर होने वाले भोज , आदि के समय ही अस्पृश्यता बरती जाती है , शुद्धता - अशुद्धता का ध्यान रखा जाता है । 

अब जाति - व्यवस्था सम्बन्धी कटोरता में शिथिलता आने के साथ - साथ अस्पृश्यों के प्रति व्यवहार में भी कटोरता कम हुई है । इतना अवश्य है कि चूंकि अस्पृश्य लोग निर्धन है , उत्पादन के साधनों पर उनका सामान्यतः अधिकार नहीं है , अन : आर्थिक , दृष्टि से वे अब भी भूस्वामियों या उच्च जातियों के लोगों की कृपा पर निर्भर करते हैं । ऐसी स्थिति में उनका शोषण भी होता है , यदा - कदा किसी मामूली कारण को लेकर उन पर अत्याचार भी होते ही हैं । उनके शोषणकर्ता तो बड़े कृपक , भूस्वामी या समृद्ध लोग हैं । आज अस्पृश्य लोगों या हरिजनों को वह सब कुछ करने को बाध्य नहीं किया जा सकता जिसके लिए स्वतन्त्रता - प्राप्ति के पूर्व तक उन्हें किया जाता था । परन्तु यह भी सही है कि वे अब भी आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से उच्च जातियों और भूस्वामियों की कृपा पर निर्भर है , विशेषतः ग्रामीण क्षेत्रों में ।

 अनुसूचित जातियों के अधिकतर लोग गांवों में कृषि श्रमिकों और औद्योगिक क्षेत्रों एवं नगरों में , कारखानों में या अन्यत्र कहीं श्रमिकों के रूप में कार्यरत हैं । इनके साथ यदाकदा अमानवीय व्यवहार किया जाता है , इन पर आक्रमण किये जाते हैं । इनके साथ मार - पीट तक की जाती है । यदि ये लोग ऐसी घटनाओं का विरोध करते हैं तो गांव में इनका सामाजिक बहिष्कार तक कर दिया जाता है । इस प्रकार की घटनाएं मध्य प्रदेश , विहार , राजस्थान , उत्तर प्रदेश , गुजरात , महाराष्ट्र , आन्ध्र प्रदेश तथा कुछ अन्य राज्यों में भी समय - समय पर घटित हो चुकी हैं । इनके पीछे प्रमुख कारण भूमि सम्बन्धी झगड़े , न्यूनतम मजदूरी से कम दर पर मजदूरी का भुगतान , ऋणग्रस्तता , बेगार , सार्वजनिक स्थानों को काम में लेने की मनाही , आदि रहे हैं । अन्य शब्दों में , शोषण से छुटकारा पाने की मांग ही इन घटनाओं के लिए प्रमुखतः उत्तरदायी है ।

अनुसूचित जातियों के सम्बन्ध में संवैधानिक व्यवस्थाएँ ( CONSTITUTIONAL PROVISIONS REGARDING SCHEDULED CASTES )


 संविधान में अनुसूचित जातियों के लिए विशेष संरक्षण की व्यवस्था की गयी है जो इस प्रकार है : 

( 1 ) संवैधानिक प्रावधान Constitutional provision

संविधान में अनेक ऐसे प्रावधान रखे गये हैं जिनके द्वारा अस्पृश्यता निवारण तथा पिछड़े वर्गों के कल्याण की ओर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है । 
  • संविधान के अनुच्छेद 15 ( 1 ) में कहा गया है कि राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म , मूलवंश , जाति , लिंग , जन्म स्थान अथवा इनमें से किसी एक के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा । दुकानों , सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान पर प्रवेश करने और साधारण जनता के उपयोग के लिए बने कुओं , तालावों , स्नान - घाटों , सड़कों , आदि के प्रयोग से कोई किसी को नहीं रोकेगा । 
  • अनुच्छेद 15 ( 4 ) में आरक्षण तथा अनुच्छेद 16 ( 4 ) में आर्थिक विकास की गारण्टी दी गई है ।
  • अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता का अन्त कर उसका किसी भी रूप में प्रचलन निषिद्ध कर दिया गया है । 
  • अनुच्छेद 19 के आधार पर अस्पृश्यों की व्यावसायिक निर्योग्यता को समाप्त किया जा चुका है और उन्हें किसी भी व्यवसाय के अपनाने की आजादी प्रदान की गयी है । 
  • अनुच्छेद 25 में हिन्दुओं के सार्वजनिक धार्मिक स्थानों के द्वार सभी जातियों के लिए खोल देने की व्यवस्था की गयी है । 
  • अनुच्छेद 29 के अनुसार राज्य द्वारा पूर्ण अथवा आंशिक सहायता प्राप्त किसी भी शिक्षण संस्था में किसी नागरिक को धर्म , जाति , वंश , अथवा भाषा के आधार पर प्रवेश से नहीं रोका जा सकता । 
  • अनुच्छेद 46 में कहा गया है कि राज्य दुर्बलतर लोगों जिनमें अनुसूचित जातियाँ तथा आदिम जातियाँ आती हैं की शिक्षा सम्बन्धी तथा आर्थिक हितों की रक्षा करेगा और सभी प्रकार के सामाजिक अन्याय एवं शोषण से उनको बचायेगा । 
  • अनुच्छेद 330 , 332 और 334 के अनुसार अनुसूचित जातियाँ तथा आदिम जातियों के लिए संविधान लागू होने के 20 वर्ष तक लोकसभा , विधान सभा , ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों में स्थान सुरक्षित रहेंगे बाद में यह अवधि दस - दस वर्ष के लिए तीन वार और बढ़ा दी गयी । 
  • अनुच्छेद 335 में कहा गया है कि संघ या राज्य के कार्यों से सम्बन्धित सेवाओं एवं पदों के लिये नियुक्तियाँ करने में अनुसूचित जातियों तथा आदिम जातियों के हितों का ध्यान रखा जायेगा । 
  • अनुच्छेद 146 एवं 338 के अनुसार अनुसूचित जातियों के कल्याण एवं हितों की रक्षा के लिए राज्य में सलाहकार परिषदों एवं पृथक् - पृथक् विभाग की स्थापना का प्रावधान किया गया है । साथ ही यह भी बताया गया है कि राष्ट्रपति अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए एक विशेष पदाधिकारी नियुक्त करेगा । 

इन संवैधानिक व्यवस्थाओं के द्वारा अस्पृश्यता निवारण एवं अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े वर्गों के उत्थान का सरकार के द्वारा विशेष प्रयत्न किया गया है । अनुसूचित जातियों एवं आदिम जातियों के विद्यार्थियों के लिए निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की गयी । सन् 1944-45 से अस्पृश्य जातियों के छात्रों को छात्रवृत्तियाँ देने योजना प्रारम्भ की गयी । इन जातियों के विद्यार्थियों में शिक्षा का अधिक से अधिक प्रसार करने हेतु न केवल उन्हें निःशुल्क शिक्षा की सुविधा और छात्रवृत्तियाँ ही दी गयीं बल्कि इनके लिए मुफ्त पुस्तकों एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं का प्रवन्ध भी किया गया । कई स्थानों पर तो इन्हें वस्त्र एवं भोजन भी स्कूल की ओर से ही दिया जाता है । संघीय लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित अखिल भारतीय एवं अन्य केन्द्रीय सेवाओं की परीक्षा के लिए तैयारी करने के उद्देश्य से अनुसूचित जातियों एवं आदिम जातियों के विद्यार्थियों के लिए 9 प्रशिक्षण केन्द्र और राज्य के लोक सेवा आयोग द्वारा ली जाने वाली परीक्षा की तैयारी हेतु 13 प्रशिक्षण केन्द्र चल रहे हैं ।

 ( 2 ) विधान मण्डल एवं पंचायतों में प्रतिनिधित्व - Representation in Legislature and Panchayats

 संविधान में अनुसूचित जातियों के लिए उनकी संख्या के अनुपात में राज्य की विधान सभाओं तथा पंचायतों में स्थान सुरक्षित रखे गये हैं । पहले ये स्थान संविधान लागू होने के 30 वर्ष तक के लिए सुरक्षित रखे गये वाद में यह अवधि 20 वर्ष अर्थात् 25 जनवरी , सन् 1990 तक के लिए बढ़ा दी गयी और फिर इसे सन् 2010 तक के लिए बढ़ा दिया गया  । इस समय लोकसभा के 543 स्थानों में से 79 और राज्य की विधान सभाओं के 4,047 स्थानों में से 557 स्थान अनुसूचित जातियों तथा 527 स्थान अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित रखे गये हैं । पंचायती राज संस्थाओं में भी इनके लिए स्थान सुरक्षित रखे गये हैं । इन सब व्यवस्थाओं के फलस्वरूप अनुसूचित जातियों में राजनीतिक चेतना निरन्तर बढ़ती जा रही है । 

( 3 ) कल्याण एवं सलाहकार संगठन ( Welfare and Advisory Organizations ) 

केन्द्र एवं राज्यों में अनुसूचित जातियों , जनजातियों , एवं पिछड़े वर्गों के कल्याण हेतु अलग अलग विभागों की व्यवस्था की गयी है । कई राज्यों में तो अनुसूचित जातियों व पिछड़े वर्गों के कल्याण को ध्यान में रखकर पृथक् मन्त्रालय भी स्थापित किये गये हैं । विशेष अधिकारी , जिसे अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के कमिश्नर के नाम से पुकारते हैं , की व्यवस्था भी की गयी है । 

( 4 ) सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व - Representation in government jobs

 अनुसूचित जातियों के लोगों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने , अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार करने तथा उच्च जाति के लोगों के सम्पर्क में आने को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी नौकरियों में स्थान सुरक्षित रखे गये हैं । खुली प्रतियोगिता द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर की जाने वाली नियुक्तियों में 15 प्रतिशत तथा अन्य प्रकार से की जाने वाली नियुक्तियों में 16-2 / 3 प्रतिशत स्थान अनुसूचित जातियों के लिए सुरक्षित होते हैं । तीसरी और चौथी श्रेणियों में सीधी नियुक्ति के लिए जिनमें सामान्य रूप से स्थानीय अथवा क्षेत्रीय उम्मीदवार आते हैं , राज्यों तथा केन्द्र शासित क्षेत्रों की अनुसूचित तथा आदिम जातियों की जनसंख्या के अनुपात में स्थान सुरक्षित किये जाते हैं । दूसरी , तीसरी तथा चौथी श्रेणियों में विभागीय परीक्षाओं के आधार पर तथा तीसरी एवं चौथी श्रेणी में चयन के आधार पर होनी वाली पदोन्नति के सम्बन्ध में भी अनुसूचित जातियों तथा आदिम जातियों के लोगों के लिए क्रमशः 15 तथा 7.5 प्रतिशत स्थान सुरक्षित रखे जाते हैं , बशर्ते इन श्रेणियों में सीधी भर्ती 50 प्रतिशत से अधिक न होती हो । वरिष्ठता के आधार पर होनी वाली पदोन्नतियों में भी 27 नवम्बर , 1972 से अनुसूचित जातियों के लिए स्थान सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गयी है । सरकारी नौकरी प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करने की दृष्टि से अनुसूचित जातियों के सदस्यों की आयु सीमा तथा योग्यता मानदण्ड में भी विशेष की व्यवस्था की गयी है । 

( 5 ) आर्थिक उन्नति हेतु प्रयास - Efforts for economic growth

अनुसूचित जातियों के व्यक्तियों को आर्थिक उन्नति के अवसर प्रदान करने हेतु सरकार ने उन्हें विशेष सुविधा देने का प्रयास किया है । जनवरी 1976 में सरकार द्वारा पारित वन्धक श्रमिक उन्मूलन कानून का विशेष लाभ अनुसूचित जाति के लोगों को ही मिला है । सन् 1978 में सरकार द्वारा इस उद्देश्य से एक उच्चाधिकार समिति का गठन किया गया है जिससे कि अस्पृश्य जातियों की आर्थिक स्थिति एवं नौकरी सम्बन्धी सुविधाओं की सही जानकारी मिल सके ।

अस्पृश्यता ( अपराध ) अधिनियम , 1955 ( THE UNTOUCHABILITY ( OFFENCE ) ACT , 1955

 अस्पृश्यता को समाप्त करने , इससे सम्बन्धित सभी आचरणों को रोकने और अस्पृश्यता बरतने वाले को दण्डित करने के उद्देश्य से जून 1955 से सारे देश में अस्पृश्यता ( अपराध ) अधिनियम , 1955 लागू किया गया । इस अधिनियम में 17 धाराओं के द्वारा अस्पृश्यों की सभी निर्योग्यताओं को समाप्त कर दिया गया । 1976 में इस अधिनियम में संशोधन कर इसका नाम नागरिक अधिकार संरक्षण कानून ( Civil Right Protection Act . 1976 ) कर दिया गया । इस अधिनियम में जो प्रावधान किये गये , उनमें प्रमुख हैं
  1.  अस्पृश्यता अपराध से दण्डित व्यक्ति लोकसभा एवं विधान सभा का चुनाव नहीं लड़ सकेंगे । 
  2. अस्पृश्यता ज्ञातव्य अपराध है । 
  3. पहली बार अस्पश्यता सम्बन्धी अपराध के लिये छ : माह की कैद और 100 रुपये से 500 रुपये तक का जुर्माना । दुवारा अपराध करने पर छ : माह से एक वर्ष तक की कैद व 200 रु . से 500 रु . तक जुर्माना । तीसरी बार अपराध करने पर एक वर्ष से दो वर्ष तक की कैद एवं 1.000 रु . तक जुर्माना करने का प्रावधान है । 
  4. अस्पृश्यता का प्रचार करना भी अपराध है । 
  5. सामूहिक रूप से अस्पृश्यता वरतने पर सामूहिक जुर्माना करने का प्रावधान है । 
  6. कानून का उल्लंघन करने वालों को दण्डित करने हेतु विशेष अधिकारी एवं अदालत के गठन का प्रावधान है । 
  7. पूजा स्थान पर अस्पृश्यता दण्डनीय है । 
  8. इस मामले में सरकारी कर्मचारी यदि उपेक्षा बरतता है तो वह भी दण्डनीय है । 
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