त्रि-टर्मिनल युक्तियाँ ( Three Terminal Devices ) क्या होती हैं?




त्रि-टर्मिनल युक्तियाँ ( Three Terminal Devices )


त्रि - टर्मिनल युक्तियाँ दो प्रकार की होती हैं -

 ( 1 ) एकल सन्धि युक्ति , जैसे एकल सन्धि ट्रान्जिस्टर ( unijunction transistor or UJT ) जिसमें तीन टर्मिनल ( उत्सर्जक , आधार -1 तथा आधार -2 ) वाला सिलिकॉन डायोड होता है ।

( 2 ) द्विक सन्धि युक्तियाँ , जैसे क्षेत्र प्रभाव ट्रान्जिस्टर ( field effect transistor या FET ) तथा द्विध्रुवी सन्धि ट्रान्जिस्टर ( bipolar junction transistor या BJT ) । 


यहाँ हम त्रि - टर्मिनल की द्वि - सन्धि युक्तियों में , क्षेत्र प्रभाव ट्रान्जिस्टर तथा द्विध्रुवी सन्धि ट्रान्जिस्टर का अध्ययन करेंगे ।


क्षेत्र प्रभाव ट्रान्जिस्टर ( FET ) में निर्गत धारा को विद्युत् क्षेत्र द्वारा नियन्त्रित किया जाता है । इसमें धारा प्रवाह में केवल एक ही प्रकार के आवेश वाहक ( इलेक्ट्रॉन अथवा होल ) भाग लेते हैं , अतः इसे एक - ध्रुवीय ट्रान्जिस्टर ( unipolar transistor ) कहते हैं ।  


सन्धि ट्रान्जिस्टर में धारा प्रवाह में इलेक्ट्रॉन तथा होल दोनों ही भाग लेते हैं , इसलिए सन्धि ट्रान्जिस्टर को द्वि - ध्रुवी सन्धि ट्रान्जिस्टर ( bipolar junction transistor या BJT ) कहते हैं । 

क्षेत्र प्रभाव ट्रान्जिस्टर के प्रकार -

मुख्य रूप से दो प्रकार के FET उपयोग में लाये जाते हैं -


 ( 1 ) सन्धि क्षेत्र प्रभाव ट्रान्जिस्टर ( junction field effect transistor या JFET ) 


 ( 2 ) धातु ऑक्साइड अर्द्ध - चालक क्षेत्र प्रभाव ट्रान्जिस्टर ( metal - oxide semi - conductor field effect transistor या MOSFET ) । इसे अवरुद्ध गेट क्षेत्र प्रभाव ट्रान्जिस्टर ( insulated gate field effect transistor या IGFET ) भी कहते हैं । 


यहाँ हम केवल सन्धि क्षेत्र प्रभाव ट्रान्जिस्टर का ही अध्ययन करेंगे ।


सन्धि क्षेत्र प्रभाव ट्रान्जिस्टर ( Junction Field Effect Transistor )

सन्धि क्षेत्र प्रभाव ट्रान्जिस्टर ( JFET ) की संरचना निम्नलिखित दो प्रकार से की जाती है : 

( 1 ) N चैनल JFET 

( 2 ) P चैनल JFETI 


( 1 ) N चैनल JFET -

             


इसमें चित्र a. की भाँति N - प्रकार के अर्द्ध - चालक की एक पतली छड़ लेते हैं जिसके ठीक मध्य में दोनों विपरीत पृष्ठों पर P - प्रकार के अर्द्ध - चालकों से दो सन्धियाँ बनायी जाती हैं । इस प्रकार , छड़ के दोनों ओर दो P-N सन्धियाँ बन जाती हैं । 


दोनों P - प्रकार की पर्ते आन्तरिक रूप से आपस में जुड़ी होती हैं ( अर्थात् दोनों के लिए एक ही उभयनिष्ठ सिरा होता है ) । इस सिरे को गेट ( gate ) कहते हैं तथा इसे अक्षर G द्वारा प्रदर्शित करते हैं । 


इस सिरे को किसी विभव से जोड़ने पर दोनों सन्धियों के P अर्द्ध - चालक, समान विभव पर होते हैं। दोनों सन्धियों के बीच के क्षेत्र को चैनल ( channel ) कहते हैं । 


N अर्द्ध - चालक के दोनों किनारों से सिरे निकाल लिये जाते हैं , जिन्हें स्रोत ( source ) तथा ड्रेन ( drain ) कहते हैं तथा इन्हें क्रमश : अक्षर S तथा D द्वारा प्रदर्शित करते हैं । 


D व S के बीच विभवान्तर लगाने पर N चैनल के बहुसंख्यक आवेश वाहक ( अर्थात् इलेक्ट्रॉन ) आरोपित विभव के अनुसार गति करने लगते हैं , जिससे चैनल में होकर धारा बहने लगती है ।



(2) P चैनल JFET -


इसमें उपरोक्त चित्र b की भाँति P - प्रकार के अर्द्ध - चालक की एक पतली छड़ लेते हैं जिसके ठीक मध्य में दोनों विपरीत पृष्टों पर N - प्रकार के अर्द्ध - चालकों से दो सन्धियाँ बनायी जाती हैं । इस प्रकार , छड़ के दोनों ओर दो P-N संधियां बन जाती हैं । 


दोनों N - प्रकार की पर्ते आन्तरिक रूप से आपस में जुड़ी होती हैं । इनके उभयनिष्ठ सिरे को गेट G कहते हैं । P अर्द्ध - चालक के दोनों किनारों से निकले सिरों को स्रोत S तथा ड्रेन D कहते हैं D व S के बीच विभवान्तर लगाने पर P चैनल के बहुसंख्यक आवेश वाहक ( अर्थात् होल ) आरोपित विभव के अनुसार गति करने लगते हैं जिसके फलस्वरूप चैनल से होकर धारा बहने लगती है ।

JFET के टर्मिनल -

JFET में निम्नलिखित तीन इलेक्ट्रोड अथवा टर्मिनल होते हैं :

( 1 ) स्रोत ( Source ) S - यह वह टर्मिनल है जिससे बहुसंख्यक आवेश वाहक चैनल क्षेत्र में प्रवेश करते हैं ।

( 2 ) ड्रेन ( Drain ) D - यह वह टर्मिनल है जिससे बहुसंख्यक आवेश वाहक चैनल क्षेत्र से बाहर निकलते हैं ।

 ( 3 ) गेट ( Gate ) G - यह वह टर्मिनल है जो छड़ के दोनों ओर लगी अशुद्ध अर्द्ध - चालक की सन्धियों को जोड़ता है ।

                N चैनल JFET में P - प्रकार का गेट होता है तथा P चैनल JFET में N - प्रकार का गेट होता है ।


चित्र c तथा d मेंं N व P चैनल JFET के संकेत प्रदर्शित हैं । इनके संकेतों में अन्तर करने के लिए गट टर्मिनल पर तीर लगा देते हैं , जो गेट धारा की दिशा प्रदर्शित करता है , जबकि गेट - स्त्रोत सन्धि अग्र अभिनति में होती है। तो ( चित्र c में) N चैनल JFET में तीर की दिशा गेट से चैनल की ओर होती है ( क्योंकि गेट P - प्रकार का है ) तथा (चित्र d में) P चैनल JFET में तीर की दिशा चैनल से गेट की ओर होती है ( क्योंकि गेट N - प्रकार का है )। चित्र c तथा चित्र d क्रमशः चैनल N तथा P चैनल JFET के प्रतीक है ) ।


ध्यान रहे कि वास्तव में गेट - स्रोत सन्धि को पश्च अभिनति में रखा जाता है , अत : कोई धारा नहीं बहती है ( अर्थात् गेट धारा नगण्य होती है ) ।

JFET का प्रचालन ( Operation of JFET )

चित्र ( a ) तथा ( b ) में क्रमश : N चैनल JFET तथा । P चैनल JIFET का विद्युत परिपथ प्रदर्शित जिसमें Vgs तथा Vds क्रमश : गेट - स्रोत वोल्टेज तथा ड्रेन - स्रोत वोल्टेज क्रमशः बैटरी X तथा बैटरी Y द्वारा लगाये गये हैं ।



धारा प्रवाह में अवक्षय पर्त का प्रभाव -

प्रारम्भ में जबकि गेट - स्रोत अथवा ड्रेन - स्रोत के बीच कोई विभवान्तर आरोपित नहीं होता है तो P - N सन्धियों पर अवक्षय पर्ते बन जाती हैं । 


अब यदि बैटरी द्वारा ड्रेन तथा स्रोत के बीच विभव Vds लगाया जाता है तथा गेट को शून्य विभव पर रखा जाता है तो आवेश वाहक ( N चैनल में इलेक्ट्रॉन तथा P चैनल में होल ) चित्र c तथा d की भाँति अवक्षय पर्तों के बीच चैनल से होकर स्रोत से ड्रेन की ओर प्रवाहित होने लगते हैं । 


आवेश वाहकों के लिए उपलब्ध चैनल की चौड़ाई ( या अनुप्रस्थ काट ) , अवक्षय पर्तों की मोटाई पर निर्भर करती है । स्पष्टतः अवक्षय पर्तों की मोटाई जितनी अधिक होती है , आवेश वाहकों की गति के लिए उपलब्ध चैनल की चौड़ाई उतनी ही कम होती है ।



जब गेट व स्रोत के बीच पश्च अभिनति होती है तो अवक्षय पर्त की मोटाई बढ़ जाती है , फलतः चैनल की चौड़ाई घट जाती है । 


चूँकि अवक्षय पर्त में केवल निश्चल अशुद्ध आयन होते हैं तथा कोई मुक्त आवश वाहक नहीं होते हैं , अत : इस बढ़ी चौड़ाई की अवक्षय पर्त से चालन लगभग शून्य होता है , अर्थात् चैनल का यह भाग आवेश वाहकों के प्रवाह में प्रतिरोध उत्पन्न करता है ।


इस प्रकार , पश्च अभिनति वोल्टेज बढ़न अवक्षय पर्तों के बीच की चैनल का प्रभावी अनुप्रस्थ क्षेत्रफल घटता जाता है फलत : चैनल का प्रतिराध बढ़ता जाता है तथा स्रोत से ट्रेन की ओर प्रवाहित धारा घटती जाती है । 


इसके विपरीत , यदि गेट व स्रोत के बीच पश्च अभिनति वोल्टेज घटता है तो अवक्षय पर्तों की चौड़ाई घट जाती है जिसके फलस्वरूप स्रोत से ड्रेन का आर प्रवाहित धारा बढ़ती जाती है । 


इस प्रकार , नियत ड्रेन - स्रोत वोल्टेज के लिए ड्रेन धारा , गेट - स्रोत वोल्टेज पर निर्भर करती है या दसरे शब्दों में , गेट पर आरोपित वोल्टेज , ड्रेन धारा को नियन्त्रित करता है । स्पष्टत : चूंकि गेट स्त्रोत पश्च अभिनति में है , अत : गेट द्वारा ली गयी धारा अति अल्प होती है , अर्थात् JFET का गेट व स्रोत व निवेशी प्रतिरोध बहुत अधिक होता है ।

चित्र से स्पष्ट है कि चैनल की अनुप्रस्थ काट स्रोत के पास अधिक होती है , जबकि ड्रेन के सिरे कम होती है । इसका कारण यह है कि चैनल की लम्बाई के अनुदिश कुछ विभव पतन हो जाने से ड्रेन सिरे के पास पश्च अभिनति बढ़ जाती है । इस प्रकार स्पष्ट है कि गेट पर आरोपित विभव ( अर्थात् विद्युत् क्षेत्र ) ड्रेन धारा को नियन्त्रित करता है , इसीलिए इसे क्षेत्र प्रभाव ट्रान्जिस्टर कहते हैं ।


JFET के धारा - वोल्टेज अभिलाक्षणिक वक्र ( Current - Voltage Characteristic Curves of JFET )




चित्र ( a ) तथा ( b ) में क्रमश : N चैनल तथा P चैनल JFET के अभिलाक्षणिक वक्र खींचने लिए विद्युत् परिपथ प्रदर्शित हैं । यहाँ बैटरी B1 को परिवर्ती प्रतिरोध Rh1 की सहायता से विभव विभाजक बनाकर गेट G तथा स्रोत S के बीच वोल्टेज Vgs लगाने के लिए प्रयुक्त किया गया है जिससे कि गेट G पश्च अभिनति में रहे ।


वोल्टेज Vgs को वोल्टमीटर ( V1 ) से पढ़ा जा सकता है । इसी प्रकार , बैटरी B2 , पारवती प्रतिरोध Rh2 , द्वारा विभव विभाजक बनाकर ड्रेन D तथा स्रोत S के बीच वोल्टेज Vds लगाने लिए प्रयुक्त किया गया है । वोल्टेज Vds को वोल्टमीटर ( V2 ) की सहायता से तथा ड्रेन धारा ID को मिलीअमीटर ( mA ) द्वारा पढ़ा जा सकता है ।


अभिलाक्षणिक वक्र ( Characteristic curves ) -

JFET के निम्नलिखित दो प्रकार के आभलाक्षणिक वक्र खींचे जा सकते हैं :
( 1 ) निर्गत अभिलाक्षणिक
( 2 ) अन्योन्य अभिलाक्षणिक ।

( 1 ) निर्गत अथिलाक्षणिक ( Output characteristics )

गेट व स्रोत के बीच वोल्टेज Vds को नियत रखकर ड्रेन धारा ID तथा ड्रेन व स्रोत के बीच वोल्टेज Vds के बीच खींचा गया ग्राफ निर्गत अभिलाक्षणिक वक्र कहलाता है । इसे उपरोक्त चित्र में दर्शाया गया है । इन वक्रों को निम्नलिखित तीन और बाँटा जा सकता है -


( a ) ओमी अथवा रैखिक क्षेत्र
( b ) संतृप्त क्षेत्र
( c ) भंजन क्षेत्र ।

( a ) ओमी अथवा रैखिक क्षेत्र ( Ohmic or linear region ) - यहाँ Vds  अति अल्प है तथा ड्रेन धारा , ड्रेन - स्रोत वोल्टेज के अनुक्रमानपाती है ( अर्थात ID  Vds ) | इस क्षेत्र में चैनल छड़ , एक ओमी चाल ( या रैखिक प्रतिरोधक ) की भाँति व्यवहार करती है ।

( b ) संतृप्त क्षेत्र ( Saturation region ) - 
यहाँ ड्रेन धारा ID  लगभग नियत हो जाती है तथा ड्रेन - स्रोत वोल्टेज Vds  पर निर्भर नहीं करती है । जब चैनल से होकर धारा प्रवाह प्रारम्भ हो जाता है तो धारा प्रवाह के कारण छड़ की लम्बाई के अनुदिश विभव पतन होता है जिसके फलस्वरूप गेट - स्रोत सन्धि और अधिक पश्च अभिनति दशा में हो जाती है , अतः चैनल की प्रभावी अनुप्रस्थ काट कम हो जाती है । 


अब Vds का मान और बढ़ाने पर Vds  = Vp पर ID  का मान संतृप्त हो जाता है । इस स्थिति में चैनल को संकुलन ( pinched off) स्थिति में कहा जाता है तथा Vp को संकुलन वोल्टेज या पिन्च - ऑफ वोल्टेज कहते हैं ।


( c ) भंजन क्षेत्र ( Breakdown region ) -
यहाँ छैन - स्रोत वोल्टेज Vds  में थोड़ी - सी वृद्धि होने पर ड्रेन धारा ID एकदम तेजी से बढ़ती है । जब ड्रेन - स्रोत वोल्टेज Vds बहुत अधिक हो जाता है तो Vds का मान और अधिक बढ़ाने पर किसी एक विशेष मान पर सन्धि भंजन ( breakdown ) हो जाता है तथा ड्रेन धारा एकदम बढ़ती है । 


चित्र में विभिन्न वक्रों से स्पष्ट है कि गेट - स्रोत के बीच पश्च अभिनति वोल्टता बढ़ाने पर , भंजन वोल्टेज घटती है । ध्यान रहे कि JFET के दोनों सिरों ( अर्थात स्रोत व ड्रेन ) के बीच भंजन वोल्टेज से कम वोल्टेज ही लगाया जा सकता है ।

( 2 ) अन्योन्य अभिलाक्षणिक ( Transfer characteristics ) 

इसे निर्गत अभिलाक्षणिक वक्र की सहायता से खींचा जाता है । निर्गत अभिलाक्षणिक वक्रों से विभिन्न Vgs  के मानों के संगत ID का संतृप्त मान ( ID)sat ज्ञात करके ( ID)sat तथा Vgs के बीच एक ग्राफ खींचा जाता है जिसे अन्योन्य अभिलाक्षणिक कहते हैं। स्पष्ट है कि जैसे - जैसे गेट - स्रोत के बीच पश्च अभिनति Vgs बढ़ती जाती है , संतृप्त ड्रेन धारा ( ID घटती जाती है )।

इसे चित्र में दिखाया गया है । गेट - स्रोत वोल्टेज Vgs का वह मान जबकि संतृप्त ड्रेन धारा शून्य हो जाती है , गेट - स्रोत संस्तब्ध वोल्टेज  ( Vgs)off  कहलाता है।





 ड्रेन धारा ID तथा गेट - स्रोत वोल्टेज Vgs में निम्नलिखित सम्बन्ध होता है :
ID =  ( ID)sat  × (1- Vgs/( Vgs)off)^2           .......(1)

जहाँ  ( Vgs)off को गेट - स्रोत संस्तब्ध वोल्टता ( eate - source cut off voltage ) कहते हैं । इसका मान संकुलन वोल्टेज Vp के बराबर होता है ।

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